लाइव पलामू न्यूज: दीपावली से एक दिन पहले छोटी दिवाली का त्योहार मनाया जाता है। जिसे रूप चौदस, नरक चतुर्दशी या काली चौदस भी कहते हैं। नरक चतुर्दशी के दिन शिव पूजा, माता काली, भगवान वामन, हनुमान, यमदेव और भगवान कृष्ण की पूजा करने से मृत्यु के बाद नरक नहीं जाना पड़ता है। इस दिन कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करने से पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है। नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व होता है।
तिल के तेल से शरीर की मालिश के बाद अपामार्ग यानि चिरचिरा को सिर के ऊपर से चारों ओर 3 बार घुमाएं। कई जगहों पर कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी (अहोई अष्टमी) के दिन एक लोटे में पानी भरकर रखते हैं। नरक चतुर्दशी के दिन इस लोटे का जल स्नान के पानी में मिलाकर स्नान करने की परंपरा है। ऐसा करने से नरक के भय से मुक्ति मिलती है।
स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना करें। ऐसा करने से पापों का नाश हो जाता है। वहीं इस दिन यमराज के निमित्त तेल का दीया घर के मुख्य द्वार से बाहर की ओर लगाते हैं। इस दिन निशीथ काल (अर्धरात्रि का समय) में घर से बेकार के सामान फेंक देना चाहिए। इस परंपरा को दारिद्रय नि:सारण कहा जाता है। नरक चतुर्दशी के निशीथ काल में कुछ लोग काली पूजा करते हैं। इसलिए इससे काली चौदस भी कहा जाता है।
कथा:-
नरकासुर/ भौमासुर ने अपने आतंक से पूरे पृथ्वी पर त्राहिमाम मचा रखा था। उसे स्त्री के हाथों मरने का श्राप था। जिस कारण उसने 16,000 कन्याओं का हरण कर रखा था। उसके आतंक से त्रस्त देवराज इंद्र ने कृष्ण से भौमासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरूड़ पर सवार हो वहां पहुंचे। जहां भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के 6 पुत्रों- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।
मुर का वध का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। चूंकि भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर दिया।
जिस दिन श्रीकृष्ण ने भौमासुर का वध किया था उस दिन कार्तिक माह क चतुर्दशी थी इसलिए उसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण ने भौमासुर की कैद से 16 हजार कन्याओं को मुक्त कराया था। इसी खुशी के कारण दीप जलाकर उत्सव मनाया जाता है।
वहीं दक्षिण भारत में वामन पूजा का प्रचलन है। कहते हैं कि इस दिन राजा बलि (महाबली) को भगवान विष्णु ने वामन अवतार में हर साल उनके यहां पहुंचने का आशीर्वाद दिया था। इसी कारण वहां वामन पूजा की जाती है। असुरराज बलि बोले, हे भगवन! आपने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या की अवधि में मेरी संपूर्ण पृथ्वी नाप ली है, इसलिए जो व्यक्ति मेरे राज्य में चतुर्दशी के दिन यमराज के निमित्त दीपदान करेगा, उसे यम यातना नहीं हो और जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का पर्व मनाए, उनके घर को लक्ष्मीजी कभी न छोड़ें। ऐसा वरदान दें। यह प्रार्थना सुनकर भगवान वामन बोले- राजन! ऐसा ही होगा। इस वरदान के बाद से ही नरक चतुर्दशी के दिन यमराज के निमित्त व्रत, पूजन और दीपदान का प्रचलन आरंभ हुआ।
एक समय में रंति देव नामक एक धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था फिर भी जब मृत्यु का समय आया तो यमदूत उन्हें नरक ले जाने के लिए आ धमके। राज ने कहा कि आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है।
यह सुनकर यमदूत ने कहा कि- हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था, यह उसी पाप कर्म का फल है। यह सुनकर राजा ने यमदूत से एक वर्ष का समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी चिंता लेकर ऋषियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा।
तब ऋषि ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। जिसके बाद राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ।
