लाइव पलामू न्यूज: वर्ष में 24 एकादशी आती है। जिसमें सभी एकादशी तिथि का अपना विशेष महत्व है। उनमें भी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि। जिसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, विष्णु प्रबोधिनी एकादशी, देव-प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान, देव उथव एकादशी, देवउठनी एकादशी, कार्तिक शुक्ल एकादशी नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार माह के लंबे समय के बाद योग निद्रा से जागते हैं, उसके साथ ही चातुर्मास का समापन होता है।
श्रीहरि विष्णु सृष्टि के संचालन का दायित्व फिर से संभाल लेते हैं। इस दिन से ही विवाह, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य भी शुरू हो जाते हैं। बता दें कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं जिसके कारण मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं। इस दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है।
कैसे करें पूजन:-
गन्ने का मंडप बनाएं और बीच में चौक बनाएं। चौक के मध्य में भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति रखें। चौक के साथ ही भगवान के चरण चिह्न बनाए जाते हैं, जो ढके रहें। भगवान को गन्ना, सिंघाडा और फल-मिठाई अर्पित करें। फिर घी का एक दीपक जलाएं। जिसे रात भर जलने दें। फिर भोर में भगवान के चरणों की विधिवत पूजा करें और चरणों को स्पर्श करके उनको जगाएं। कीर्तन कर व्रत-उपवास की कथा सुनें। मान्यता है कि भगवान के चरणों का स्पर्श करके जो मनोकामना मांगी जाए वो पूरी हो जाती है। इस दिन व्रत रखने से जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि देवउठनी एकादशी का व्रत करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
एकादशी व्रत कथा:-
एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन किसी दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आकर बोला: महाराज! मुझे नौकरी पर रख लें। तब राजा ने उसके सामने शर्त रखी कि रोज तो तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा, पर एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा। उस व्यक्ति ने उस समय हाँ कर दी। लेकिन एकादशी के दिन जब उसे फलाहार दिया गया तो वह राजा के सामने जाकर गिड़गिड़ाने लगा: महाराज! इससे मेरा पेट नहीं भरेगा। मैं भूखा मर जाऊंगा, मुझे अन्न दे दो।
राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई, पर वह अन्न छोड़ने को तैयार नहीं हुआ, तब राजा ने उसे आटा-दाल-चावल आदि दिए। वह नित्य की भांति नदी पर पहुंचा और स्नान कर भोजन पकाने लगा। जब भोजन बन गया तो उसने भगवान को बुलाया! आओ प्रभु! भोजन तैयार है उसके बुलाने पर भगवान आए तथा प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे। भोजनादि करके भगवान अंतर्धान हो गए तथा वह अपने काम पर चला गया। पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिए। उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया। राजा के कारण पूछने पर उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं। इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता। यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला: मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं। मैं तो इतना व्रत रखता हूँ, पूजा करता हूँ, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए।
राजा की बात सुनकर वह बोला: महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाकर भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान न आए। अंत में उसने कहा: हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा। लेकिन भगवान नहीं आए। जिसके कारण वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। उसका दृढ़ इरादा जान भगवान ने उसे रोका और साथ बैठकर भोजन करने लगे। जिसे देख राजा ने निश्चय किया कि वह भी प्रेम भाव से ईश्वर को प्राप्त करेगा।
तुलसी विवाह कथा:-
एक समय की बात है शिव ने अपने तेज को समुद्र में फेंक दिया। जिससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। जो आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। उसका विवाह दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंद से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। वह अपनी सत्ता के मद में चूर माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया, परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया। वहाँ से पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया।
वह भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु माता उसे अपने योगबल से पहचान गयी और वहां से अंतर्ध्यान हो गईं। जिसके बाद देवी पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान विष्णु को सुनाया। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसके पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत आवश्यक था।
इसी कारण भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वहां जा पहुंचे जहाँ वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं। ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जालंधर के बारे में पूछा। जिस पर ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा मूर्छित हो कर गिर पड़ीं।
होश में आने पर उन्होंने ऋषि से विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया। लेकिन स्वयं भी उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को इस छल का तनिक भी आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा ने जैसे ही पतिव्रता व्यवहार किया उसका सतीत्व भंग हो गया। जिससे वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया। जब इसकी खबर वृंदा को हुई तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को ह्रदयहीन शिला होने का श्राप दे दिया। भगवान विष्णु ने इस श्राप को स्वीकार किया और शालिग्राम पत्थर बन गये।
उनके पत्थर बन जाने से ब्रह्मांड में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई। यह देखकर सभी देवी देवताओ ने वृंदा से प्रार्थना की वह भगवान् विष्णु को श्राप मुक्त कर दे। वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर आत्मदाह कर लिया। जहाँ वृंदा भस्म हुईं, वहाँ तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा: तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। तब से हर साल कार्तिक महीने के देवोत्थान एकादशी के दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
