लाइव पलामू न्यूज: सबको नमस्कार/जोहार, मैं पलामू बोल रहा हूं। बुधवार, 1 जनवरी यानी आज मैं 133 वर्ष का हो गया। 1 जनवरी, 1892 को मेरी स्थापना की गई। इससे पहले मैं 1857 के विद्रोह के ठीक बाद डाल्टनगंज मुख्यालय वाला एक अनुमंडल हुआ करता था। 1871 में परगना जपला और बेलौजा को गया से पलामू में स्थानांतरित कर दिया गया। पलामू का प्रारंभिक इतिहास किंवदंतियों और परंपराओं में डूबा हुआ है। झारखंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित मैं (पलामू) बिहार, चतरा, हज़ारीबाग, और लातेहार ज़िलों से घिरा हुआ हूं।

जिसका ज़िला मुख्यालय मेदनीनगर है। यह शहर, कोयल नदी के दाहिने किनारे बसा है। झारखंड बनने से पहले ही मैने विकास को गति देने के लिए दो जिला गढ़वा व लातेहार को जन्म दिया। बता दूं कि ज़िले में चेरो राजवंश ने 200 सालों तक शासन किया था। जिनके सबसे प्रतापी राजा मेदिनी राय हुआ करते थें। पहले मेदिनीनगर को डाल्टनगंज के नाम से जाना जाता था लेकिन आनंदमार्ग के लक्ष्मण सिंह, बैद्यनाछ साहू, युगलकिशोर सिंह, विश्वनाथ सिंह, जगनारायण सिंह जैसे लोगों के लंबे आंदोलन के बाद शहर का नाम मेदनीनगर किया गया। ऐसा नहीं है कि पलामू में प्रतिभा की कमी है।

यहां के लोगों ने हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। बात करें यहां के राजनीतिज्ञों की तो इंदर सिंह नामधारी(लोक सभा अध्यक्ष), ज्ञानचंद पांडेय, शैलेंद्र, केडी सिंह आदि मुख्य हैं। वहीं पत्रकारों में आलोक प्रकाश पुतुल ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता हासिल की है। अन्य पत्रकारों में रामेश्वरम, गोकुल बंसंत, फैयाज अहमद, उपेन्द्र नाथ पान्डेय, अरूण कुमार सिंह आदि का नाम शामिल हैं। गढ़वा जिला निवासी उपेन्द्र नाथ पांडेय ने झारखंड और बिहार में अपनी लोकप्रियता हासिल की है।
साहित्य व कविता जगत में बिंदु माधव शर्मा, विद्या वैभव भारद्वाज व अभिनव मिश्र ने पलामू का नाम रौशन किया है। बावजूद इसके आज भी मुझे अकाल व सुखाड़ के लिए जाना जाता है। गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, पलायन व कुपोषण से जिला ग्रसित जिलों की सूची में मेरा नाम दर्ज है। मैंने कितने ही प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को अपने आंगन में देखा है। जिन्होंने मेरी बेहतरी का वादा किया था। बावजूद इसके अब तक मेरे हालात बेहतर नहीं हुए।
आज भी अपेक्षाकृत विकास की उम्मीदें लगाए मैं बैठा हूं। मेरी धरती से जन्मे व कार्यक्षेत्र बनाकर कई केंद्रीय मंत्री ,विधानसभा अध्यक्ष समेत कई केंद्र व राज्य में मंत्री बने। इतना ही नहीं यहां से कितने सांसद व विधायक भी बनें। बावजूद मेरी बदहाली बरकरार है। मेरे आंगन में रह रही 20 लाख से अधिक आबादी अब भी विकास की बाट जोह रही है। सुना है इस बार पुनः नयी सरकार बनी है और उसने विकास के वादे भी किए हैं। मेरी ही धरती का लाल वित्त मंत्री भी है। ऐसे में फिर से एक आस बंधी है कि शायद मेरा कायाकल्प हो जाए। अगले वर्ष तक मैं कुछ विशेष बता पाऊं स्वयं के बारे में।
