लाइव पलामू न्यूज: माघ माह में पड़ने वाली पूर्णिमा को माघी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष माघी पूर्णिमा 12 फरवरी, बुधवार को पड़ रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माघ पूर्णिमा के दिन श्रीहरि विष्णु स्वयं ही गंगाजल में निवास करते हैं। इसलिए इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से विष्णुजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। माघ पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की भी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।

माघ पूर्णिमा के दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही उपासना के बाद मंदिर या फिर गरीब लोगों में विशेष चीजों का दान करना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि पूजा और दान करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही धन लाभ के योग भी बनते हैं।

कथा:-

पौराणिक कथा के अनुसार, नर्मदा नदी के तट पर शुभ्रवत नामक विद्वान ब्राह्मण रहते थें। वह बहुत लालची थें।उनका लक्ष्य था धन कमाना। ऐसा करते-करते वे समय से पहले ही बूढ़े दिखने लगे और कई बीमारियों की चपेट में आ गए। इसी बीच उन्हें अंतर्ज्ञान हुआ कि उन्होंने सारा जीवन धन कमाने में बीता दिया और अब उनका उद्धार कैसे होगा।

तब उन्हें माघ माह में स्नान का महत्व वाला एक श्लोक याद आया। इसके बाद स्नान का संकल्प लेकर वे नर्मदा नदी में स्नान करने लगे‌। 9 दिनों तक स्नान करने पर उनकी तबीयत और ज्यादा खराब हो गई और उनकी मृत्यु का समय आ गया। उन्होंने सोचा कि जीवन में कोई सत्कार न करने के कारण उन्हें नरक का दुख भोगना पड़ेगा। लेकिन मात्र 9 दिनों तक माघ मास में स्नान करने के कारण उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

दूसरी कथा:-

एक अन्य कथा के अनुसार, कांतिकानगर में धनेश्वर नाम का ब्राह्मण रहता था। उनका जीवन निर्वाह का जरिया दान था। ब्राह्मण और उसकी पत्नी की कोई संतान नहीं थी। एक दिन उसकी पत्नी नगर में भिक्षा मांगने गई लेकिन सभी ने उसे बांझ कहकर भिक्षा देने से इनकार कर दिया। तब किसी ने ब्राह्मण की पत्नी से 16 दिन तक काली मां की पूजा करने को कहा और उसके कहने पर ब्राह्मण दंपत्ति ने ऐसा ही किया।

उनकी आराधना से प्रसन्न होकर मां काली प्रकट हुईं और उस ब्राह्मण की पत्नी को गर्भवती होने का वरदान दिया और कहा कि अपने सामर्थ्य अनुसार तुम हर पूर्णिमा को एक दीपक जलाओ‌। हर पूर्णिमा के दिन एक दीपक बढ़ाती जाना जब तक कम से कम 32 दीपक न हो जाएं।

ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को पूजा के लिए पेड़ से कच्चा फल तोड़कर दिया। उसकी पत्नी ने पूजा की जिसके फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई। वह प्रत्येक पूर्णिमा को मां काली के कहे अनुसार दीपक जलाती रही। माता की कृपा से उसके घर में एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम देवदास रखा गया। देवदास जब बड़ा हुआ तो उसे अपने मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा गया।

वहां एक दुर्घटना के कारण धोखे से देवदास का विवाह हो गया। देवदास ने कहा कि वह अल्पायु है लेकिन फिर भी जबरन उसका विवाह करा दिया गया। कुछ समय बाद काल देवदास के प्राण लेने आए लेकिन ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्णिमा का व्रत रखा था इसलिए काल उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। इसी कारण मान्यता है कि पूर्णिमा का व्रत सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है।

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