गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांय,
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।

गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान। तीन लोक की संपदा, सो गुरु दीन्ही दान।।

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिले न मोष। गुरु बिन लखे न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष।।

कितने ही दोहे और चित्रण हैं जिनमें गुरु की महिमा का वर्णन है। गुरु के बिना इस संसार रूपी भवसागर से पार पाना असंभव है।

यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों में गुरु मे गु का अर्थ अन्धकार या अज्ञान और रू का अर्थ प्रकाश (अन्धकार का निरोधक) । अर्थात् अज्ञान को हटा कर प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले जाने वाले को ही गुरु कहा जाता हैं। गुरू की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार होता है गुरू की कृपा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं। मान्यता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास जी अवतरित हुए थें।

इसी दिन आदिगुरु परमेश्वर शिव दक्षिणामूर्ति रूप में समस्त ऋषि मुनि को शिष्य के रूप शिवज्ञान प्रदान किया था। उनके स्मरण में ही गुरुपूर्णिमा मानाया याता है। गुरु पूर्णिमा उन सभी आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित परम्परा है। गुरु पूर्णिमा भारत, नेपाल और भूटान में हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायी उत्सव के रूप में मनाते हैं। महात्मा गांधी ने अपने आध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचन्द्र सम्मान देने के लिए इसे पुनर्जीवित किया।

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।

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