लाइव पलामू न्यूज: 27 सालों बाद एक बार फिर से दिल्ली की कमान भाजपा के हाथ में होगी। भाजपा की प्रचंड जीत ने यह साबित कर दिया कि जनता का मिजाज कब बदल जाए यह समझ पाना मुश्किल है। ऐसे भी कहावत है कि राजनीति में दो बातें बहुत महत्वपूर्ण है। पहला किसी राजनीतिक पार्टी या किसी नेता के बारे में जनता के मन में क्या राय है और दूसरा यह कि प्रतीकात्मक तौर पर आम जनता ने सियासी दल और लीडरशिप की क्या छवि बना रखी है।

अगर दिल्ली की राजनीति के संदर्भ में देखा जाए तो आम आदमी पार्टी की करारी हार के पीछे दो बातें सामने आई हैं। पहला तो यह कि आम आदमी पार्टी जो कि भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ कर सत्ता में आई। लेकिन वह स्वयं ही भ्रष्टाचार के आरोपों से इतना घिर गई कि उसका निकलना संभव नहीं हो सका। दूसरा अरविंद केजरीवाल के शीशमहल ने आम आदमी की छवि को बड़ा झटका दिया। ऐसे में केजरीवाल की ‘राजनीति बदल देंगे’ की राजनीति की कहानी धराशायी हो गई।

दरअसल, अरविंद केजरीवाल खुद को आम आदमी का चेहरा बता कर राजनीति में आए थें। केजरीवाल ने अन्ना हजारे जैसे गांधीवादी नेता को आगे कर राजनीति बदलने की उम्मीद जगाई थी। उन्होंने युवाओं के जनमानस में उन्होंने अपनी जगह बनाई थी। अब जब दिल्ली की सत्ता में उन्होंने 10 साल बीता दिए तो लोगों की उम्मीद किस प्रकार टूटी यह दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं।

एक जेनरेशन ने केजरीवाल के पक्ष में जमकर लामबंदी की। राजनीति के जानकारों की मानें तो दिल्ली की जनता पहले भी अपने मिजाज से निर्णय लेती रही है। जहां लोकसभा चुनाव में वह केंद्र की मजबूत सरकार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देखती रही थी। लेकिन दिल्ली में वह आम आदमी पार्टी को ही चाहती थी। बीते तीन चुनावों में तो यह साफ तौर पर नजर आया। 2013 में अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने 28 सीटों पर जीत हासिल की थी।

वहीं अगली बार वर्ष 2015 में उससे भी जोरदार जीत हासिल करते हुए 67 सीटों पर कब्जा कर लिया। वहीं 2019 में भी AAP ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। AAP का सत्ता पर काबिज रहना निश्चित तौर पर जनता का उनके प्रति विश्वास था भरोसा था। लेकिन, हाल के दिनों में जब उनकी कलई खुलने लगी और आम आदमी पार्टी के भ्रष्टाचार की बातें उजागर होने लगीं तो जनता ने मन बनाना शुरू कर दिया।

इसी दौरान सत्येंद्र जैन, सोमनाथ भारती, मनीष सिसोदिया समेत बड़े-बड़े दिग्गजों को जेल जाना पड़ा। जब शराब घोटाले के कनेक्शन के सूत्रधार के तौर पर अरविंद केजरीवाल के सामने आने पर आम आदमी के पैरों के तले जमीन खिसक गई। जाहिर तौर पर बदलाव की राजनीति का मिथक टूटा तो जनता का मन भी टूट गया।

जिस शीला दीक्षित के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर अरविंद केजरीवाल सत्ता पर काबिज हुए और आम आदमी पार्टी का दिल्ली से आगे अलग-अलग राज्यों में विस्तार किया। लेकिन जब ‘आप’ की राजनीति का सच सामने आया तो लोगों का दिल टूट गया। जनता के सामने कोई विकल्प भी नहीं था।

कांग्रेस कमजोर है और वर्तमान भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा नरेंद्र मोदी तमाम हमलों के बाद भी जनता के सिरमौर हैं। ऐसे में दिल्ली की जनता ने अरविंद, केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, सत्येंद्र जैन और सोमनाथ भारती समेत पूरी बड़ी लीडरशिप को जमीन दिखाते हुए 27 वर्षों बाद फिर से बीजेपी पर अपना भरोसा जताते हुए सत्ता सौंप दी।

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