लाइव पलामू न्यूज: अंततः बिहार/छठ कोकिला जिंदगी की जंग हार गई। मंगलवार देर शाम उन्होंने दिल्ली के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। एम्स ने खबर की पुष्टि की है। उल्लेखनीय है कि पद्म भूषण से सम्मानित लोक गायिका शारदा सिन्हा को 26 अक्टूबर को एम्स के कैंसर सेंटर में मेडिकल आंकोलाजी वार्ड में भर्ती किया गया था। जहां उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट भी दिया गया। बाद में उनकी हालत में सुधार होने के बाद प्राइवेट वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया था, लेकिन सोमवार देर शाम उनकी तबीयत अचानक फिर बिगड़ गई। इस वजह से उन्हें दोबारा आइसीयू में स्थानांतरित करना पड़ा। बताते चलें कि शारदा सिन्हा वर्ष 2018 से मल्टीपल मायलोमा से पीड़ित थीं। यह एक तरह ब्लड कैंसर है।
बिहार के हुलास जिले में 1 अक्टूबर 1952 को जन्मी शारदा सिन्हा की बिहार के लोक संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका है। भोजपुरी, मैथिली और मगधी संगीत में उन्होंने योगदान दिया। शारदा सिन्हा के ‘छठ गीतों’ ने हर आयु वर्ग को प्रभावित किया है, जिससे उन्हें अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ाव का एहसास होता है। वैसे तो शारदा सिन्हा ने कई हिंदी फिल्मों में भी गाने गाए हैं, लेकिन उनकी पहचान छठ पूजा के गीतों से अधिक है। उन्हें बिहार कोकिला के रूप में भी जाना जाता है।
उनके छठ पूजा के गीत के कायल इस महापर्व में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति है। जिस तरह स्वर कोकिला के बारे में पूरी दुनिया जानती है। ठीक इसी तरह, ‘छठ कोकिला’ के रूप में शारदा सिन्हा मशहूर हैं। उन्होंने अपने करियर में एक से एक हिट गाने दिए। पहली बार बॉलीवुड में गाना गाने का मौका दिया राजश्री प्रोडक्शन ने। खुद तारा चंद्र बड़जात्या ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया। उन्होंने ‘मैंने प्यार किया’ का ‘कहे तो से सजना’ गाना गाया जोकि सुपरहिट रहा।आगे चलकर उन्होंने बॉलीवुड में तार बिजली से लेकर कौन सी नगरिया जैसे कई गाने गाए।
शारदा का ससुराल बेगुसराय में है। शारदा सिन्हा गायिका के साथ-साथ प्रोफेसर भी रह चुकी हैं। उन्होंने बीएड की पढ़ाई कर म्यूजिक में पीएचडी की। जिसके बाद समस्तीपुर के कॉलेज में वे प्रोफेसर बन गईं। उनकी रुचि हमेशा से गायिकी में ही थी। इसलिए उन्होंने इसे ही अपने करियर के तौर पर भी चुना। गायिका के तौर पर फेमस होने के बाद भी वह अपनी नौकरी भी करती रही और कॉलेज से रिटायर भी हुईं।
शारदा सिन्हा के परिवार में 30-35 सालों तक किसी बेटी का जन्म नहीं हुआ था। शारदा का जन्म काफी मन्नतों के बाद हुआ था। वे 8 भाईयों की इकलौती बहन थीं। जब शारदा शादी करके ससुराल आईं तो बड़ी बहू होने के नाते सास ने उन्हें छठ के एक-एक रीति-रिवाज और नियम-कायदे सिखाए। वह छठ को बारीकी से समझने लगीं और खुद भी इन रिवाजों को निभाने लगीं. इसी के साथ इन गानों में भी वह निपुण होती गईं।
शारदा सिन्हा के पैरेंट्स और फैमिली के साथ-साथ उनके करियर में ससुरालवालों का भी खासा योगदान रहा। शारदा सिन्हा के हुनर की पहचान सर्वप्रथम उनके पिता ने की। जिसके बाद उन्होंने बेटी को संगीत सिखाने का फैसला लिया। अपने पीहर से शुरू हुआ संगीत का सिलसिला ब्याह के बाद भी जारी रहा। उन्हें पति का सपोर्ट मिला तो ससुर ने भी खूब साथ दिया। लेकिन शुरुआत में सास, बहू के गाने-बजाने से नाराज हो गई। सास का कहना था कि घर में भजन गाने तक ठीक है।लेकिन ऐसे बाहर गाना-बजाना उचित नहीं है। इस कठिन समय में उन्हें पति के साथ-साथ ससुर का भी भरपूर सहयोग मिला।
पुरस्कार:-
शारदा सिन्हा के योगदान को देखते हुए साल 1991 में पद्मश्री, 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2006 में राष्ट्रीय आहिल्या देवी अवॉर्ड, 2015 में बिहार सरकार पुरस्कार और 2018 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
