लाइव पलामू न्यूज: वैसे तो हर माह में आने वाले संकष्टी चतुर्थी व्रत का अपना महत्व है। लेकिन मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि जिसे गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत के नाम से जाना जाता है। इसका अपना विशेष महत्व है। चतुर्थी महीने में दो बार आती है, एक शुक्ल पक्ष और एक कृष्ण पक्ष में। यह दिन भगवान गणेश की पूजा के लिए समर्पित है। मान्यता है कि चतुर्थी व्रत का उपवास तभी पूरा होता है, जब चंद्रमा को अर्घ्य और इसकी व्रत कथा का पाठ किया जाए। मान्यता है कि चतुर्थी का व्रत करने वाले भक्त का श्रीगणेश हर संकट हर लेते हैं और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण कर देते हैं।
कैसे करें पूजन:-
प्रातः काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात श्री गणेश जी का पूजन पंचोपचार (धूप,दीप, नैवेद्य,अक्षत,फूल) विधि से करें। इसके बाद हाथ में जल तथा दूर्वा लेकर श्री गणेश का ध्यान करते इस मंत्र को बोलें
“मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये”
अब कलश में जल भरकर उसमें थोड़ा गंगा जल मिलाएं। कलश में दूर्वा, सिक्के, साबुत हल्दी रखें। उसके बाद लाल कपड़े से कलश का मुख बांधें। कलश पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। शाम के समय पुनः स्नान कर शुद्ध होकर श्री गणेश जी की पूजा करें। उन्हें नैवेद्य के रूप में 10 लड्डु अर्पित करें। चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य दें। तत्पश्चात गणेश चतुर्थी की कथा सुनें व हवन करें। गणेश जी की आरती कर 5 लड्डु प्रसाद के रूप में बांट दें और शेष 5 अगले दिन ब्राह्मण को दान कर दें।
कथा:-
एक बार नदी के किनारे माता पार्वती भगवान शंकर के साथ बैठी थीं। तभी उन्होंने चौपड़ खेलने की इच्छा हुई लेकिन उनके अलावा कोई तीसरा नहीं था, जो चौपड़ के खेल के दौरान हार और जीत का निर्णय कर सके। ऐसे में शिव जी ने और मां पार्वती ने एक मिट्टी का बालक बनाकर उसमें प्राण का संचालन किया। इसके पश्चात चौपड़ में माता पार्वती लगातार तीन से चार बार विजयी हुईं, लेकिन उस मिट्टी के बालक ने शिव जी को विजयी घोषित कर दिया।
जिससे माता पार्वती को क्रोध आ गया और उन्होंने उस बालक को लंगड़ा बना दिया। जिसके बाद बालक को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने माफी मांगी। तब माता पार्वती ने कहा कि ”श्राप अब वापस नहीं लिया जा सकता। उन्होंने बताया कि ”संकष्टी के दिन कुछ कन्याएं पूजन के लिए आती हैं, उनसे व्रत और पूजा की विधि पूछना। बालक ने पूजा विधि जानकर व्रत और पूजा किया। उसकी पूजा से गौरी पुत्र गणेश प्रसन्न हुए और उसके जीवन की सभी समस्याओं का अंत कर दिया।
त्रेतायुग में दशरथ नामक एक प्रतापी राजा थे। उन्हें आखेट अतिप्रिय था। एक बार अनजाने में आखेट के दौरान उन्होंने एक श्रवणकुमार नामक ब्राह्मण का वध कर दिया। जिसके बाद ब्राह्मण के अंधे मां-बाप ने राजा को श्राप दिया कि जिस प्रकार हम लोग पुत्रशोक में मर रहे हैं, उसी भांति तुम भी पुत्रशोक में प्राण त्यागोगे। इससे राजा को बहुत चिंता हुई। उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। फलस्वरूप जगदीश्वर ने राम और भगवती लक्ष्मी जानकी के रूप में अवतरित हुई। पिता की आज्ञा पाकर भगवान राम, सीता और लक्ष्मण सहित वन को गए जहां उन्होंने खर-दूषण आदि अनेक राक्षस व राक्षसियों का वध किया।
इससे क्रोधित होकर रावण ने सीताजी का अपहरण कर लिया। सीता जी की खोज में भगवान राम ने पंचवटी का त्याग कर दिया और ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचकर सुग्रीव के साथ मैत्री की। तत्पश्चात सीता जी की खोज में हनुमान आदि वानर तत्पर हुए। ढूंढते-ढूंढते वानरों ने गिद्धराज संपाती को देखा। इन वानरों को देखकर संपाती ने पूछा कि कौन हो? इस वन में कैसे आये हो? जिस पर वानरों ने उत्तर दिया कि वे दशरथ नंदन रामजी, सीता और लक्ष्मण जी के साथ दंडकवन में आए हैं।
वहां उनकी पत्नी सीताजी का अपरहण कर लिया गया है। जिसे सुनकर संपाति ने उत्तर दिया कि आप संकटनाशक गणेश चतुर्थी का व्रत करें इसके प्रभाव सेज्ञसमुद्र को क्षणभर में पार किया जा सकेगा। लेंगे। उनके बताने के बाद हनुमान जी ने इस व्रत को किया। जिसके प्रभाव से हनुमान जी क्षणभर में समुद्र को लांघ गए।
