Varuthini Ekadashi : वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी व्रत किया जाता है। हिन्दू धर्म में इस व्रत को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष 24 अप्रैल गुरुवार के दिन वरूथिनी एकादशी व्रत किया जाएगा।
वरुथिनी एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत से एक दिन पहले यानि दशमी के दिन कांस, उड़द, मसूर, चना, कोदो, शाक, मधु, किसी दूसरे का अन्न, दो बार भोजन तथा काम क्रिया, इन दस बातों का त्याग करना चाहिए।

एकादशी के दिन भगवान का पूजन कर भजन कीर्तन करना चाहिए। वहीं द्वादशी के दिन पूजन कर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। अतः दक्षिणा देकर विदा करने बाद स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। एकादशी के व्रत में सोना, पान खाना, दांतुन, दूसरे की बुराई, चुगली, चोरी, हिंसा, काम क्रिया, क्रोध तथा झूठ का त्याग करना चाहिए।
वरुथिनी एकादशी का महत्व :
पद्मपुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को वैशाख माह के कृष्णपक्ष की एकादशी का फल एवं महात्मय बताते हुए कहा कि हे धर्मराज लोक और परलोक में सौभाग्य प्रदान करने वाली है। इस व्रत को करने से साधक को लाभ प्राप्त होता है तथा उसके पापों का नाश संभव होता है। यह एकादशी भक्त को समस्त प्रकार के भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली होती है।
वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को कठिन तपस्या करने के समान फल की प्राप्ति होती है। एकादशी के दिन प्रात:काल समस्त क्रियाओं से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। विधि पूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत कर एकादशी की रात्रि में जागरण करना चाहिए तथा भजन किर्तन करते हुए श्री हरि की का मनन करना चाहिए।
वरूथिनी एकादशी कथा:-
कथा के अनुसार मांधाता, इक्ष्वाकुवंशीय नरेश थें जिनकी प्रसिद्धि दूर – दूर तक थी। कहा जाता है कि इन्हें सौ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों का कर्ता और दानवीर, 4 धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट् जो वैदिक अयोध्या नरेश मंधातृ जैसा अभिन्न माना जाता था।
यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और पचास कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं जो एक साथ सौभरि ऋषि से ब्याही गई थीं।
पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ के हवियुक्त मंत्रपूत जल को प्यास में भूल से पी लेने के कारण युवनाश्व को गर्भ रह गया जिसे ऋषियों ने उसका पेट फाड़कर निकाला। वह गर्भ एक पूर्ण बालक के रूप में उत्पन्न हुआ था जो इंद्र की तर्जनी उँगली को चूसकर रहस्यात्मक ढंग से पला और बड़ा हुआ।
इंद्र द्वारा दुध पिलाने तथा पालन करने के कारण इनका नाम मांधाता पड़ा। यह बालक आगे चलकर पर पराक्रमी राजा बना। उन्होंने विष्णु जी से राजधर्म और वसुहोम से दंडनीति की शिक्षा ली थी इसी वरूथिनी एकादश के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग को गए।
इसी प्रकार राजा धुन्धुमार को भगवान शिव ने एक बार क्रोद्धवश श्राप दे दिया था जिसके कारण उन्हें बहुत सारे कष्टों की प्राप्ति हुई उनसे मुक्ति के मार्ग के लिए धुन्धुमार ने तब इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उन्हें श्राप से मुक्ति प्राप्त हुए और वह उत्तम लोक को प्राप्त हुए।