लाइव पलामू न्यूज : नवरात्रि के चौथे दिन माता के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। माता को सृष्टि की सृजन शक्ति माना जाता है। मान्यता है कि जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, तब माता ने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसलिए इन्हें ‘आदि शक्ति’ के नाम से भी जाना जाता है।
मां कूष्मांडा की पूजा भक्तों के रोग, भय और दरिद्रता हर लेती है और आयु, यश, बल और सुख-समृद्धि में वृद्धि करती है। कुष्मांडा की पूजा से भक्तों के सभी रोग, दुख और कष्ट समाप्त हो जाते हैं। इनके पूजन से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है और मनुष्य की आरोग्यता बनी रहती है। मां कुष्मांडा की आराधना से जीवन में सभी प्रकार की समृद्धि और सुख-शांति का प्रवेश होता है।
माता का स्वरुप :-
मां कूष्मांडा के आठ हाथ हैं, जिनमें उन्होंने कमल, धनुष-बाण, गदा, चक्र, अमृत कलश, जप माला और कमंडल धारण कर रखा है। इनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है। उनका यह स्वरूप शक्ति, समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है।
ध्यान मंत्र :-
सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु मे॥