LIVE PALAMU NEWS DESK : सोमवार, 4 अगस्त को झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरू शिबू सोरेन ने 81 वर्ष की उम्र में दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनका जन्म एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से मध्यमवर्गीय था। उनके दादा, चरण मांझी, तत्कालीन रामगढ़ राजा कामाख्या नारायण सिंह के टैक्स तहसीलदार थे, जिसके कारण परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक थी। उनके पिता, सोबरन मांझी, अपने क्षेत्र के शिक्षित व्यक्तियों में से एक थे और आदिवासियों को शिक्षा के लिए प्रेरित करते थे।

सोबरन मांझी ने महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई, जिसके कारण उनकी 27 नवंबर 1957 को लुकरैयाटांड़ गांव के पास हत्या कर दी गई। इस घटना ने शिबू सोरेन के जीवन को गहराई से प्रभावित किया और उन्हें सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन की ओर प्रेरित किया। उनकी मां, सोनामणि, एक जीवट महिला थीं, जिन्होंने पति की हत्या के बाद अपने बच्चों को अकेले पाला और महाजनों के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
जन्म:
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन हजारीबाग जिले (वर्तमान रामगढ़ जिला, झारखंड) के नेमरा गांव में हुआ।
शादी:
शिबू सोरेन की शादी रूपी सोरेन (रूपी मांझी) से हुई। उनकी शादी की सटीक तारीख उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह 1960 के दशक में होने का अनुमान है, क्योंकि उस समय शिबू सोरेन अपने सामाजिक कार्यों और आंदोलनों में सक्रिय हो रहे थे। रूपी सोरेन ने उनके संघर्षों में महत्वपूर्ण सहयोग दिया और परिवार को संभाला।
बच्चे, करियर:
शिबू सोरेन और रूपी सोरेन के चार बच्चे थे—तीन बेटे और एक बेटी।
दुर्गा सोरेन (बेटा, मृत): दुर्गा सोरेन शिबू सोरेन के सबसे बड़े बेटे थे और राजनीति में सक्रिय थे। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के साथ जुड़े थे और भविष्य में पार्टी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की संभावना थी। उनकी मृत्यु 2009 में हो गई। मृत्यु के कारणों की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद हेमंत सोरेन ने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया।
हेमंत सोरेन (बेटा): जन्म: 10 अगस्त 1975, हेमंत सोरेन झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री (2025 तक) और JMM के केंद्रीय अध्यक्ष हैं। वे 2009 में दुमका से लोकसभा सांसद बने और 2013, 2019, और 2024 में झारखंड के मुख्यमंत्री बने। उनकी पत्नी, कल्पना सोरेन, भी राजनीति में सक्रिय हैं और गांडेय से विधायक हैं। उनके दो बेटे, निखिल और अंश, हैं। हेमंत ने 2005 में अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। बाद में उन्होंने JMM को मजबूत किया और झारखंड की राजनीति में अहम भूमिका निभाई।
बसंत सोरेन (बेटा): बसंत सोरेन शिबू सोरेन के सबसे छोटे बेटे हैं और वर्तमान में JMM के नेता हैं। वे झारखंड की चंपई सोरेन सरकार में मंत्री रहे हैं। बसंत ने दुमका से विधानसभा चुनाव लड़ा और सक्रिय रूप से JMM की राजनीति में शामिल हैं। उनकी उम्र और अन्य व्यक्तिगत विवरण सार्वजनिक रूप से कम उपलब्ध हैं, लेकिन वे परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
अंजलि सोरेन (बेटी): अंजलि सोरेन शिबू सोरेन की इकलौती बेटी हैं।
झारखंड आंदोलन और शिबू सोरेन:
पिता की हत्या और आंदोलन की शुरुआत : शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन की हत्या 1957 में सूदखोरों (महाजनों) ने कर दी थी। इस घटना ने उन्हें सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महाजनों के खिलाफ “धनकाटो आंदोलन” शुरू किया, जिसमें वे और उनके साथी जबरन महाजनों के खेतों से धान काटकर ले जाते थे। यह आंदोलन कई बार हिंसक भी हुआ, जिसमें लोगों की जानें गईं और उन पर कई मुकदमे दर्ज हुए।
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गठन: 1972 में, शिबू सोरेन ने बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। JMM का मुख्य उद्देश्य झारखंड को एक अलग राज्य बनाना और आदिवासियों के हितों की रक्षा करना था।
अलग राज्य के लिए संघर्ष: शिबू सोरेन ने अलग झारखंड राज्य के लिए एक लंबा और कठिन संघर्ष किया। उन्होंने आदिवासी और मूलवासी लोगों को एकजुट किया और शराबबंदी, सूदखोरी और आदिवासियों की जमीन हड़पने वाले जमींदारों के खिलाफ आंदोलन चलाए।
नरसंहार और अन्य आरोप:
शिबू सोरेन पर उनके राजनीतिक जीवन के दौरान कई आरोप लगे, जिनमें से कुछ नरसंहार से भी जुड़े हैं।
चिरूडीह नरसंहार: 1975 में, शिबू सोरेन पर झारखंड के चिरूडीह गांव में हुई हिंसा को भड़काने का आरोप लगा था, जिसमें कम से कम 10 लोग मारे गए थे। इस मामले में, शिबू सोरेन को गिरफ्तार करने का वारंट जारी हुआ था, जिसके बाद वे काफी समय तक भूमिगत रहे। बाद में, 2004 में, उन्होंने कोर्ट में सरेंडर किया। हालांकि, इस मामले में उन्हें बाद में बरी कर दिया गया।
राजनीतिक करियर :
शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर संथाल परगना में 1977 के बाद शुरू हुआ, जब वे टुंडी से विधानसभा चुनाव हार गए और संथाल परगना को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। उन्होंने 1980 में दुमका से पहली बार लोकसभा चुनाव जीता। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1970 के दशक में महाजनी प्रथा और शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन से हुई, लेकिन संथाल परगना में उनकी सक्रियता 1977 के बाद बढ़ी, जब उन्होंने दुमका को अपना केंद्र बनाया।
लोकसभा और राज्यसभा चुनाव जीत:
लोकसभा (दुमका): शिबू सोरेन ने दुमका लोकसभा सीट से निम्नलिखित वर्षों में जीत हासिल की:
1980
1989
1991
1996
2002
2004
2009
2014 (1984 में वे कांग्रेस के पृथ्वीचंद किस्कू से हार गए थे, और 1998-1999 में भी हार का सामना करना पड़ा।)
राज्यसभा:
10 अप्रैल 2002 से 2 जून 2002 तक सदस्य रहे।
2002 में दोबारा चुने गए। 2020 में तीसरी बार राज्यसभा सांसद बने।
इसके अतिरिक्त, शिबू सोरेन 1985 में जामा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए।
वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी रहे:
2005 (10 दिन), 2008-09 (6 महीने), और 2009-10।
शिबू सोरेन केंद्र में कोयला मंत्री तीन बार बने:
23 मई 2004: मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में पहली बार कोयला मंत्री बने। उन्हें 24 जुलाई 2004 को इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि 1975 के चिरूडीह नरसंहार मामले में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हुआ था, जिसमें 11 लोगों की हत्या हुई थी। इस मामले में वे कुछ समय के लिए फरार भी हो गए थे।
नवंबर 2004: जमानत मिलने के बाद उन्हें दोबारा कोयला मंत्री बनाया गया, लेकिन 2005 में झारखंड के मुख्यमंत्री बनने के कारण यह पद छोड़ा।
2006: तीसरी बार कोयला मंत्री बने, लेकिन 1994 में उनके निजी सचिव शशि नाथ झा की हत्या के मामले में दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें 2006 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हालांकि, 2007 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सबूतों की कमी के कारण उन्हें बरी कर दिया।
इस्तीफे का मुख्य कारण:
पहली बार (2004): चिरूडीह नरसंहार मामले में गिरफ्तारी वारंट के कारण इस्तीफा देना पड़ा।
बाद में: मुख्यमंत्री बनने और आपराधिक मामलों (जैसे शशि नाथ झा हत्याकांड) में कानूनी उलझनों के कारण मंत्रिपद छोड़ना पड़ा।