साहित्य जगत में नई चेतना की गूंज, विद्वानों ने कहा – “यह काव्य संग्रह समाज की आत्मा की आवाज़”
मेदिनीनगर : शिक्षिका-सह-कवयित्री रीना प्रेम दुबे की काव्य कृति ‘करुण पुकार’ का भव्य लोकार्पण समारोह होटल ब्लू बर्ड में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना के साथ हुआ, जिसके पश्चात् मंच पर साहित्यिक ऊर्जाओं का संगम देखने को मिला। मुख्य अतिथि झारखंड विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी ने पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा अंधकार है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है, मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नहीं है।” उन्होंने कहा कि ‘करुण पुकार’ में संवेदना और सृजनशीलता का अद्भुत संतुलन है, जो पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. सुरेंद्र प्रसाद मिश्र (समकालीन जवाबदेही के संपादक) ने कहा कि रीना प्रेम दुबे की कविताएँ महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। डीईओ संदीप कुमार ने इसे “एक शिक्षिका की कलम से निकला साहित्यिक गर्व” बताते हुए कहा कि कवयित्री की भाषा प्रवाहपूर्ण और भावनाएँ अत्यंत सजीव हैं।
साहित्यकार कुमार मनीष अरविंद ने कहा कि कवयित्री ने अपनी रचनाओं में हिंदी भाषा की शुद्धता और भावों की तीव्रता दोनों को जीवित रखा है। वहीं, शंभुनाथ पांडेय ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण और मार्गदर्शक होता है — और ‘करुण पुकार’ इस भूमिका को बखूबी निभाती है।
सिद्धेश्वर विद्यार्थी ने कहा कि यह काव्य संग्रह पढ़ने योग्य कृति है, जो कवयित्री को साहित्य में सम्मानित पहचान दिलाएगा।
सुरेंद्र कुमार मिश्र ने टिप्पणी की रीना प्रेम दुबे की कविताओं में भावों की भूख और करुणा की बौछार दोनों झलकती हैं। समारोह की अध्यक्षता छंदशास्त्री श्रीधर प्रसाद द्विवेदी ने की और संचालन कवि राकेश कुमार ने किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में द्विवेदी ने कहा कि नारी संवेदना की मूर्त रूप होती है और कवयित्री ने उसे अपनी कविताओं में गहराई से व्यक्त किया है।
कार्यक्रम में सत्येंद्र चौबे ‘सुमन’ ने अतिथियों का स्वागत किया, परशुराम तिवारी ने पुस्तक परिचय प्रस्तुत किया तथा रमेश कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस मौके पर जिले और बाहर से आए दर्जनों साहित्यकारों राम लखन दुबे, विनोद तिवारी, धनञ्जय पाठक, प्रेम प्रकाश दुबे, ममता झा, अनुपमा तिवारी, वंदना श्रीवास्तव सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। ‘करुण पुकार’ के लोकार्पण ने मेदिनीनगर के साहित्यिक वातावरण में नई चेतना और भावनात्मक सरगर्मी पैदा की, जहाँ शब्दों ने संवेदनाओं को स्वर दिया और संवेदनाएँ कविताओं में रूपांतरित हो उठीं।

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