लाइव पलामू न्यूज : आज यानी रविवार से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। इस बार नवरात्रि 9 दिन की बजाय केवल 8 दिन की होगी, क्योंकि तिथियों में परिवर्तन के कारण अष्टमी और नवमी एक ही दिन पड़ रही हैं। पंचमी तिथि क्षय होने के कारण आठ दिनों की नवरात्र होगी। दो अप्रैल दिन बुधवार को चतुर्थी और पंचमी दोनों की पूजा होगी। इस बार माता हाथी पर सवार होकर पधार रही हैं और गमन भी हाथी पर ही करेंगी। जो कि अत्यधिक शुभ होता है। हाथी पर आगमन होने से खुशियां, समृद्धि, अच्छी वृर्षा का प्रतीक माना जाता है।

नवरात्र के प्रथम दिन माता के पहले स्वरूप शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। शैल का अर्थ है हिमालय और पर्वतराज हिमालय के यहां के जन्म लेने के कारण माता पार्वती को शैलपुत्री कहा गया। माता का वाहन वृषभ (बैल) है, इसलिए इन्हें वृषभारूढ़ा भी कहा जाता है। माता के इस स्वरूप की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और सभी दोष दूर होते हैं। माता चंद्रमा को दर्शाती हैं। इनकी आराधना करने से चंद्र दोष मुक्ति मिलती है।
माता का स्वरुप :
माता शैलपुत्री का स्वरूप बेहद शांत और सरल है। माता के दाएं हाथ में त्रिशूल है, जो धर्म, मोक्ष और अर्थ के द्वारा संतुलन का प्रतीक है। माता ने बाएं हाथ में कमल का फूल धारण किया हुआ है, जो स्थूल जगत में रहकर उससे परे रहने का संकेत देता है।
कथा : –
एक बार की बात है प्रजापति दक्ष ने यज्ञ किया। जिसमें सारे देवताओं को निमंत्रण दिया। सिवाय भगवान शंकर को। सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि बिना निमंत्रण वहां जाना उचित नहीं है।
लेकिन सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब वहां पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव था। वहीं दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को बहुत दुख पहुंचा। जिससे क्रोध में आकर उन्होंने अपने शरीर को भस्म कर दिया।
ध्यान मंत्र :-
वन्दे वंछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥