भाषा पर अतिक्रमण व्यक्ति के निजता, संस्कृति और जुबान पे प्रहार है। ये किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा

मेदिनीनगर : प्रदेश की सरकार ने एकबार फिर से भाषा विवाद को हवा दिया है। JTET परीक्षा हेतु जारी नियमावली जिसपर सरकार द्वारा सभी ज़िला के ज़िला शिक्षा पदाधिकारीयों से सुझाव मांगा गया है उसमें पलामू और गढ़वा ज़िला के लिए राज्य द्वारा क्षेत्रीय भाषा के रूप में नागपुरी को स्थान दिया गया है।

इसी बाबत पूर्व में भी भाषा आधारित नियोजन नीति के विरोध में मुखरता से आंदोलन करने वाले पलामू के फायरब्रांड युवा नेता आशीष भारद्वाज के नेतृत्व में आज पलामू के युवा व JTET अभियार्थियों ने जिला शिक्षा पदाधिकारी पलामू से मिलकर आग्रह किया की JTET परीक्षा हेतु क्षेत्रीय भाषा को लेकर राज्य सरकार ने जो उनसे सुझाव मांगा है।

उसमें वे मगही को स्थान देने के साथ – साथ राज्य सरकार से ये सिफारिश करें की पलमुआ डायलेक्ट को अधिसूचित कर उसे भाषा की श्रेणी में सूचीबद्ध करें। सिर्फ़ पलामू – गढ़वा में 25 लाख से ज़्यादा लोगो की ये “माई बोली” है और पूरे राज्य में 75 लाख से ज़्यादा लोग इस भाषा को बोलते है।

 

आशीष भारद्वाज ने ज़िला शिक्षा पदाधिकारी से वार्ता के दौरान उन्हें पलामू की वेदना से अवगत कराते हुए भाषायी रूप में बोलकर भी समझाया की मगही, पलमुआ और भोजपुरी में क्या अंतर है। ज़िला शिक्षा पदाधिकारी पलामू ने आशीष भारद्वाज और उपस्थित लोगों से लगभग एक घंटे से ज़्यादा की वार्ता की। मामले को पूर्ण रूप से समझा और उपस्थित लोगों से ही सुझाव मांगाते हुए ये आश्वस्त किया कि हम अपने सुझाव पत्र में पलामू की भावना का ख्याल रखते हुए और आपके दिए सुझाव को समाहित कर ही सरकार को प्रेषित करेंगे।

पलामू – गढ़वावासियों को अपमानित करने का काम कर रही है 

आशीष भारद्वाज ने कहा कि हमारी बोली हमारी पहचान है, भाषा हमारी माँ है। किसी से उसका भाषा छीन लेना उसका जुबान काट लेने के बराबर है। हमने ज़िला शिक्षा पदाधिकारी पलामू को सभी बातों से अवगत करवाया, उन्होंने हमारी बात को बहुत गंभीरता से सुना भी और हम फिर से मगही और पलमुआ डायलेक्ट पर इनके द्वारा मांगे गए सुझाओ के साथ इनसे मिलेंगे। भारद्वाज ने आगे बताया कि ये सरकार बार – बार भाषा के नाम पर हम पलामू – गढ़वा वासियों को अपमानित करने का काम कर रही है।

 

जब भी पलामू गढ़वा को अधिकार देने की बात होती है मुख्यमंत्री जी षडयंत्र रचने लगते है, कभी भाषा के नाम पर तो कभी नियोजन के नाम पर। मुख्यमंत्री जी पलामू प्रमंडल वासियों को झारखंडी मानते भी है की नहीं इनके रवैये से ये समझ नहीं आता, अगर मानते है तो फिर ये सौतेला व्यवहार क्यों।

पलामू रही है क्रांति की धरती 

या फिर हमारे राज्य के मुखिया को ये पता नहीं है की उनके प्रदेश के किस हिस्से में कौन सी भाषा बोली जाती है, अगर ऐसा है तो फिर बहुत विडंबना है। हम अपनी भाषा और संस्कृति पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं करेंगे। पलामू क्रांति की धरती रही है, हम पलामूवासी अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ना खूब जानते है, इस सरकार से लड़े है और लड़ेंगे।

पलामू की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं 

इनको सिर्फ पलामू के गिट्टी, बालू और खनिज का पैसा चाहिए लेकिन पलामू के लोगो को उनका अधिकार देने में समस्या है तो ये अब नहीं चलेगा। इस स्वाभिमान की लड़ाई को लड़ने में जिस स्तर तक जाना होगा जाएँगे, सरकार से लड़ेंगे बहुत हुआ अब पलामू की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं करेंगे।

 

डीईओ कार्यालय पलामू में वार्ता के दौरान रवि शर्मा, समाजसेवी नवीन तिवारी, शैलेश तिवारी, मधुकर शुक्ला, अजीत पाठक, चंदा झा, संदीप प्रसाद, दीपक प्रसाद, चंद्रकांत सिंह, मुकेश सिंह, शिवनारायण साव, प्रभात सिंह, गोलू मेहता,संजीत पांडेय, प्रकाश विश्वकर्मा, दिलीप गिरी, अंकित उपाध्याय, राज पांडेय, राजन पांडेय, अंकित आरंभ, सुजीत गुप्ता, प्रभात मिश्रा आदि सैकड़ो युवा और जेटेट अभियार्थी उपस्थित रहे।

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