LIVE PALAMU NEWS DESK : नवरात्रि के सातवें दिन मां के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है। माता की पूजा नकारात्मक ऊर्जा और शत्रु बाधा को दूर करने में विशेष फलदायी होती है। मां भयंकर स्वरूप के बावजूद ‘शुभंकारी’ हैं और भक्तों को अभयदान देती हैं। मां दुष्टों का विनाश और ग्रह बाधाओं को दूर करती हैं।


कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं

कथा :

पौराणिक कथा के अनुसार, रक्तबीज नामक राक्षस ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उसे वरदान था कि यदि उसके रक्त की बूंद धरती पर गिरी, तो उसी के समान शक्तिशाली एक और राक्षस उत्पन्न हो जाएगारक्तबीज के आतंक से मुक्ति के लिए माँ दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण किया, जो महाशक्तिशाली और भयंकर थीं।जब माँ कालरात्रि ने रक्तबीज का वध करने के लिए उस पर प्रहार किया, तो उसके रक्त की बूंदों से हज़ारों राक्षस पैदा हो गए। तब माता ने अपने विकराल रूप से उसका सारा रक्त अपनी जिह्वा से पी लिया और खड्ग से उसका वध कर दिया।

माता का स्वरुप :

माता गधे पर सवार, अंधकार की तरह काले वर्ण की और चार हाथों वाली हैं। मां घने अंधकार की तरह काली, बाल बिखरे हुए और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। माता के हाथों में खड्ग, लौह-वज्र, वरद और अभय मुद्रा रहती है।

मंत्र :

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता,
लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा,
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *