LIVE PALAMU NEWS DESK : शिबू सोरेन, जिन्हें “दिशोम गुरु” के नाम से भी जाना जाता है, को झारखंड और आदिवासी समुदाय में एक महत्वपूर्ण और सम्मानित व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है, हालांकि उनके प्रति दृष्टिकोण विविध और जटिल है।
आदिवासी हितों के प्रतीक:
शिबू सोरेन को झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और झारखंड अलग राज्य आंदोलन के प्रमुख नेता के रूप में आदिवासी समुदाय में व्यापक सम्मान प्राप्त है। उनके द्वारा 1970 के दशक में शुरू किए गए “धान काटो आंदोलन” और “महाजनी प्रथा” के खिलाफ संघर्ष ने उन्हें आदिवासियों के अधिकारों और जमीन की रक्षा करने वाले योद्धा के रूप में स्थापित किया।
आदिवासी समुदाय में उन्हें “भगवान की तरह पूजा” जाता है, जैसा कि 2025 में उनकी बीमारी के दौरान देखा गया, जब रजरप्पा के मां छिन्नमस्तिका मंदिर सहित कई स्थानों पर उनके लिए प्रार्थनाएं की गईं।
राजनीतिक प्रभाव:
81 वर्षीय शिबू सोरेन, जो वर्तमान में राज्यसभा सांसद और JMM के संरक्षक हैं, अब सक्रिय राजनीति में कम दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी विरासत और मार्गदर्शन JMM और उनके बेटे, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जीवित है।*
*JMM के नेताओं का मानना है कि शिबू सोरेन का “वृहद झारखंड” का सपना, जिसमें पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कुछ आदिवासी क्षेत्र शामिल हैं, अभी भी प्रासंगिक है। पार्टी इस दिशा में नई रणनीति के साथ आंदोलन तेज करने की योजना बना रही है।
विवादों का प्रभाव:
शिबू सोरेन के राजनीतिक जीवन में कई विवाद रहे, जैसे 1993 का सांसद घूसकांड, चिरूडीह नरसंहार (1975), और शशि नाथ झा हत्याकांड (1994), जिनमें वे आरोपी रहे। हालांकि, अधिकांश मामलों में वे कानूनी रूप से बरी हो गए, लेकिन इन विवादों ने उनकी छवि को कुछ हद तक प्रभावित किया।
गैर-आदिवासी और शहरी आबादी में उनके प्रति दृष्टिकोण मिश्रित है; कुछ लोग उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों से जोड़ते हैं, जबकि अन्य उनके आदिवासी संघर्ष को महत्व देते हैं।
स्वास्थ्य और भावनात्मक जुड़ाव:
2025 में उनकी बीमारी (ब्रेन स्ट्रोक और किडनी की समस्या) के दौरान, पक्ष-विपक्ष के नेताओं, जैसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, राहुल गांधी, और नितिन गडकरी, ने उनके स्वास्थ्य की कामना की, जो उनकी व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
झारखंड के आदिवासी समुदाय और JMM कार्यकर्ताओं में उनके लिए गहरी भावनात्मक लगाव है। उनकी सेहत को लेकर पूरे संथाल समाज में चिंता और प्रार्थनाएं देखी गईं।
सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान:
शिबू सोरेन को आदिवासी संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण के समर्थक के रूप में भी देखा जाता है। उन्होंने शराबबंदी, जंगल बचाओ आंदोलन, और शिक्षा जागरूकता जैसे मुद्दों पर काम किया।
उनकी पुस्तक “दिशोम गुरु: शिबू सोरेन” में उनके जीवन और संघर्ष को रेखांकित किया गया है, जो नई पीढ़ी को उनके योगदान से जोड़ने का प्रयास है।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण:
कुछ आलोचक, विशेष रूप से विपक्षी दलों और सोशल मीडिया पर, उन्हें और उनके परिवार को भ्रष्टाचार और राजनीतिक अवसरवाद से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, कांग्रेस ने उन्हें जेल भेजा और लालू यादव ने उनके आंदोलन को दबाया, जो उनके राजनीतिक संघर्ष को रेखांकित करता है, लेकिन साथ ही विवादों को भी उजागर करता है।
युवा और शहरी वर्ग में उनकी प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठते हैं, क्योंकि उनकी सक्रियता कम हो गई है और हेमंत सोरेन अब JMM का चेहरा हैं।
निष्कर्ष: 2025 में शिबू सोरेन को आदिवासी समुदाय में एक महानायक और झारखंड आंदोलन के जनक के रूप में देखा जाता है, जिनका योगदान अतुलनीय माना जाता है। उनके स्वास्थ्य और उम्र के कारण वे अब कम सक्रिय हैं, लेकिन उनकी विरासत JMM और हेमंत सोरेन के माध्यम से जीवित है। गैर-आदिवासी और शहरी आबादी में उनके प्रति दृष्टिकोण मिश्रित है, जिसमें सम्मान के साथ-साथ विवादों की छाया भी शामिल है।