लाइव पलामू न्यूज़: आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया व्रत मनाया जाता है। इस वर्ष यह त्योहार 25 सितंबर को मनाया जा रहा है। 24 सितंबर 2024 को जितिया व्रत के नहाय-खाय की पूजा इसके बाद ओठगन और फिर निर्जला व्रत की शुरुआत।

कथा:-

एक बार की बात है नैमिषारण्य के निवासी ऋषियों ने संसार के कल्याण के लिए सूतजी से पूछा कि भविष्य काल में लोगों के बालक किस तरह दीर्घायु होंगे। सूतजी ने कहा- जब द्वापर का अन्त और कलियुग का आरंभ था, उसी समय बहुत-सी महिलाओं ने आपस में बात किया कि क्या इस कलियुग में माता के जीवित रहते पुत्र मर जाएंगे? जब वे आपस में कुछ निर्णय नहीं कर पाईं तो गौतमजी के पास गईं। महिलाओं ने ऋषि से पूछा कि हे प्रभु, इस कलयुग में लोगों के पुत्र जीवित रहें, किसी आपदा का शिकार ना हों, ऐसा कोई उपाय बताएं।

इस पर गौतमजी ने बताया कि जब महाभारत युद्ध का अन्त हो गया और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा द्वारा अपने बेटों को मरा देखकर सब पाण्डव बड़े दुःखी हुए, तो पुत्र के शोक से व्याकुल होकर द्रौपदी अपनी सखियों के साथ ब्राह्मण-श्रेष्ठ धौम्य के पास गईं और कहा-‘हे विप्रेन्द्र। कौन-सा उपाय करने से बच्चे दीर्घायु हो सकते हैं, कृपया बताएं। धौम्य बोले- सत्ययुग में सत्यवचन बोलने वाला, श्रेष्ठ आचरण वाला, समदर्शी जीमूतवाहन नामक एक राजा हुआ करता था।

एक समय हालात कुछ ऐसे हुए कि वह अपनी पत्नी के साथ अपने ससुराल गया और वहीं रहने लगा। एक दिन आधी रात के समय पुत्र के शोक से व्याकुल कोई स्त्री रोने लगी,वह रोती हुई कहती थी-‘हाय, मुझ बूढ़ी माता के सामने मेरा बेटा मरा जा रहा है।’ उसका रोना सुनकर राजा जीमूतवाहन बेचैन हो उठे।

वह उस महिला के पास गए और पूछा- तुम्हारा बेटा कैसे मरा है? बूढ़ी माता ने कहा- गरुड़ प्रतिदिन आकर गांव के लड़कों को खा जाता है। राजा ने कहा कि मैं तुम्हारे बच्चे को बचाने का प्रयास करता हूं। जिसके बाद राजा उस स्थान पर गये, जहां गरुड़ रोज आता था और मांस का सेवन करता था। उसी समय गरुड़ उस स्थान पर आए और उस पर टूट पड़े और मांस खाने लगे। जब गरुड़ ने राजा का बायाँ अंग खा लिया तो झटपट राजा ने अपना दाहिना अंग फेरकर गरुड़ के सामने कर दिया। यह देखकर गरुड़ ने कहा- कौन हो तुम? क्या तुम कोई देवता हो? तुम मनुष्य तो नहीं लगते। तुम अपना जन्म और कुल बताओ। पीड़ा से तड़पते राजा ने कहा- हे पक्षिराज. इस तरह के प्रश्न करना व्यर्थ है, तुम अपनी इच्छाभर मेरा मांस खाओ’। तत्पश्चात राजा ने कहा- मेरी माता का नाम है शैव्या और मेरे पिता का नाम शालिवाहन है। मैं सूर्यवंश में जन्मा और जीमूतवाहन मेरा नाम है’। राजा की दयालुता देखकर गरुड़ ने कहा- हे देवपुरुष, तुम्हारे मन में जो अभिलाषा हो वह वर मांगो।

राजा ने कहा- हे पक्षिराज आपने अब तक जिन प्राणियों को खाया है वे सब जीवित हो जाएं। अबसे आप यहां बालकों को ना खायें और कोई ऐसा उपाय करें कि जहां जो उत्पन्न हों वे लोग बहुत दिनों तक जीवित रहें। पक्षीराज गरुड़ राजा को वरदान देकर स्वयं अमृत के लिए नागलोक चले गए। जहां से अमृत लाकर उन्होंनेउन मरे मनुष्यों की हड्डियों पर बरसाया। जिससे सब लोग जीवित हो गए, जिनको पहले गरुड़ ने खाया था। मान्यता है कि इस कथा का पाठ करने से और निर्जला व्रत रखने से संतान की सेहत बढ़िया होती है और आयु में वृद्धि होती है। राजा की दयालुता देखकर गरुड़ ने फिर कहा- ‘मैं संसार के कल्याणार्थ एक और वरदान दूँगा।

आज आश्विन कृष्ण सप्तमी से रहित शुभ अष्टमी तिथि है। आज ही तुमने यहाँ की प्रजा को जीवन दान दिया है। हे वत्स!अबसे यह दिन ब्रह्मभाव हो गया है। जो मूर्तिभेद से विविध नामों से विख्यात हैं वहीं त्रैलोक्य से पूजित दुर्गा अमृत प्राप्त करने के अर्थ में जीवित्पुत्रिका कहलायी हैं। सो इस तिथि को जो स्त्रियाँ उस जीवित्पुत्रिका की और कुश की आकृति बनाकर तुम्हारी पूजा करेंगी तो दिनों-दिन उनका सौभाग्य बढ़ेगा और वंश की भी बढ़ोत्तरी होती रहेगी।

उन्होंने कहा कि सप्तमी से रहित और उदयातिथि की अष्टमी को व्रत करें, यानी सप्तमी विद्ध अष्टमी जिस दिन हो उस दिन व्रत न कर शुद्ध अष्टमी को व्रत करें और नवमी में पारण करें। यदि इस पर ध्यान न दिया गया तो फल तो नष्ट होगा ही और सौभाग्य तो अवश्य नष्ट हो जाएगा। जीमूतवाहन को यह वरदान देकर गरुड़ वैकुण्ठ धाम को चले गये।

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